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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/13/3

35 Sukta
4 Mantra
1/13/3
Devata- विद्युत् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- चतुष्पाद्विराड् जगती Suktam- विद्युत सूक्त
Mantra with Swara
प्रव॑तो नपा॒न्नम॑ ए॒वास्तु॒ तुभ्यं॒ नम॑स्ते हे॒तये॒ तपु॑षे च कृण्मः। वि॒द्म ते॒ धाम॑ पर॒मं गुहा॒ यत्स॑मु॒द्रे अ॒न्तर्निहि॑तासि॒ नाभिः॑ ॥

प्रऽव॑त: । न॒पा॒त् । नम॑: । ए॒व । अ॒स्तु॒ । तुभ्य॑म् । नम॑: । ते॒ । हे॒तये॑ । तपु॑षे । च॒ । कृ॒ण्म॒: ।वि॒द्म: । ते॒ । धाम॑ । प॒र॒मम् । गुहा॑ । यत् । स॒मु॒द्रे । अ॒न्त: । निऽहि॑ता । अ॒सि॒ । नाभि॑: ॥

Mantra without Swara
प्रवतो नपान्नम एवास्तु तुभ्यं नमस्ते हेतये तपुषे च कृण्मः। विद्म ते धाम परमं गुहा यत्समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः ॥

प्रऽवत: । नपात् । नम: । एव । अस्तु । तुभ्यम् । नम: । ते । हेतये । तपुषे । च । कृण्म: ।विद्म: । ते । धाम । परमम् । गुहा । यत् । समुद्रे । अन्त: । निऽहिता । असि । नाभि: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (प्रवतो नपात्) = उच्च स्थान से न गिरने देनेवाले प्रभो! (तुभ्यम्) = आपके लिए (नमः एव अस्तु) = हमारा नमस्कार हो। (ते) = आपकी (हेतये) = प्रेरणा के लिए (च) = तथा तपुषे तपस्या के लिए नमः कृण्म:-हम नमस्कार करते हैं। हम आपकी प्रेरणा [हि-प्रेरणे] को सनते हैं और जीवन में तपस्या को नष्ट नहीं होने देते तो हम उन्नत-ही-उन्नत होते हैं, किसी प्रकार से हमारी अवनति नहीं होती। इसलिए यह प्रेरणा और तपस्या-दोनों ही वस्तुत: आदरणीय हैं। २. इस प्रेरणा के

अथ प्रथम काण्डम् सुनने व तपस्या को अपनाने से ही हम (ते) = आपके (परम धाम्) = उत्कृष्ट तेज को (विद्य) = जान पाते हैं। (यत्) = जो उत्कृष्ट तेज मलिन अन्त:करणों में द्रष्टव्य नहीं होता। ३. आप (नाभिः) = [णह बन्धने] इस ब्रह्माण्ड के सब लोक-लोकान्तरों को अपने में बाँधनेवाले हैं ('मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव')। आप सूत्रों-के-सूत्र हैं। ये सब लोक आपमें ही ओत-प्रोत हैं। ऐसे आप (समुद्रे) = [स-मुद्] प्रसाद से युक्त अन्तःकरण के (अन्तः) = अन्दर (निहिता असि) = स्थापित हैं। आपका दर्शन निर्मल व प्रसन्न हृदय में ही होता है। प्रसन्न मनवाले लोग ही आपके निवास स्थान हैं।
Essence
हम प्रभु की प्रेरणा को सुनें व तपस्वी बनें। यही प्रभु-दर्शन का मार्ग है।
Subject
प्रेरणा व तपस्या