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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/13/2

35 Sukta
4 Mantra
1/13/2
Devata- विद्युत् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विद्युत सूक्त
Mantra with Swara
नम॑स्ते प्रवतो नपा॒द्यत॒स्तपः॑ स॒मूह॑सि। मृ॒डया॑ नस्त॒नूभ्यो॒ मय॑स्तो॒केभ्य॑स्कृधि ॥

नम॑: । ते॒ । प्र॒ऽव॒त॒: । न॒पा॒त् । यत॑: । तप॑: । स॒म्ऽऊह॑सि ।मृडय॑ । न॒:। त॒नूभ्य॑:। मय॑: । तो॒केभ्य॑: । कृ॒धि॒ ॥

Mantra without Swara
नमस्ते प्रवतो नपाद्यतस्तपः समूहसि। मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि ॥

नम: । ते । प्रऽवत: । नपात् । यत: । तप: । सम्ऽऊहसि ।मृडय । न:। तनूभ्य:। मय: । तोकेभ्य: । कृधि ॥

Meaning
१. (प्रवतः नपात्) = उच्चता से न गिरने देनेवाले हे प्रभो! (ते नमः) = हम आपके लिए नमस्कार करते हैं। आप उच्चता से न गिरने देनेवाले इसलिए हैं, (यत:) = क्योंकि (तपः समूहसि) = आप तप का सञ्चय करते हैं। तप ही सम्पूर्ण उत्थान का मूल है। तप का विपरीत पत-पतन है। प्रभु तप:रूप हैं, अतः पूर्ण उन्नत हैं। प्रभुकृपा से हम भी तपस्वी बनते हैं और उन्नत हो पाते हैं। उन्नति तप के अनुपात में ही होती है। २. हे प्रभो! आप इस तप के द्वारा (न:) = हमारे (तनूभ्यः) = शरीरों के लिए (मृडय) = सुख देनेवाले होवें। इस तपस्या के परिणामस्वरूप हमारे शरीरों में किसी प्रकार का रोग न हो। हमें नीरोग बनाकर आप (तोकेभ्यः) = हमारे सन्तानों के लिए भी (मय:) = कल्याण (कृधि) = कीजिए। हमारे स्वस्थ शरीरों से हमारे सन्तानों के शरीर भी स्वस्थ हों।
Essence
उच्चता तपोमूलक है। तप से ही हमारे शरीर भी स्वस्थ होते हैं, परिणामत: सन्तानों का भी कल्याण होता है।
Subject
तप व उन्नति

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