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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/12/4

35 Sukta
4 Mantra
1/12/4
Devata- यक्ष्मनाशनम् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यक्ष्मनाशन सूक्त
Mantra with Swara
शं मे॒ पर॑स्मै॒ गात्रा॑य॒ शम॒स्त्वव॑राय मे। शं मे॑ च॒तुर्भ्यो॒ अङ्गे॑भ्यः॒ शम॑स्तु त॒न्वे॑३ मम॑ ॥

शम् । मे॒ । पर॑स्मै । गात्रा॑य । शम् । अ॒स्तु॒ । अव॑राय । मे॒ ।शम् । मे॒ । च॒तु:ऽभ्य॑: । अङ्गे॑भ्य: । शम् । अ॒स्तु॒ । त॒न्वे । मम॑ ॥

Mantra without Swara
शं मे परस्मै गात्राय शमस्त्ववराय मे। शं मे चतुर्भ्यो अङ्गेभ्यः शमस्तु तन्वे३ मम ॥

शम् । मे । परस्मै । गात्राय । शम् । अस्तु । अवराय । मे ।शम् । मे । चतु:ऽभ्य: । अङ्गेभ्य: । शम् । अस्तु । तन्वे । मम ॥

Meaning
१. (मे) = मेरे (परस्मै गात्राय) = शरीर के ऊपर के अङ्गों के लिए (शम्) = शान्ति (अस्तु) = हो। (मे) = मेरे (अवराय) = शरीर के निचले अङ्गों के लिए भी (शम् अस्तु) = शान्ति हो। सूर्य-किरणों का सेवन मेरे एक-एक अङ्ग को नीरोग व शान्त बनाए। सूर्य-किरणों का सेवन शरीर के उपद्रवों को दूर करनेवाला हो। २. (मे) = मेरे (चतुर्थ्य:) = चारों (अङ्गेभ्य:) = अङ्गों के लिए (शम् अस्तु) = शान्ति हो। 'सिर, छाती, उदर व टाँगे-स्थूलतया ये शरीर के चार अङ्गहैं। समाज-शरीर में ये ही 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र' कहलाते हैं। मेरे ये चारों ही अङ्ग शान्त व निरुपद्रव हों। इनके ठीक होने पर ही (मम तन्वे शम्) = मेरा सम्पूर्ण शरीर नीरोग, स्वस्थ और शान्त हो।
Essence
सूर्य-किरणों का सेवन शरीर के सब अङ्गों को शान्त और निरुपद्रव बनाता है।
Subject
चारों अङ्गों में शान्ति
Special
सूक्त के प्रथम मन्त्र में सूर्य को रोगों को नष्ट करनेवाला कहा है [१]। यह रोगों को काट देता है [२]। सिरदर्द, खाँसी व सन्धिपीड़ा से मुक्त करता है [३]। शरीर के चारों अङ्गों को शान्त रखता है। इन सूर्य-किरणों का व हवि का ही सेवन करनेवाला यह व्यक्ति भृगु है, 'भ्रस्ज पाके' अपनी शक्तियों का ठीक से परिपाक करता है और अपने सब अङ्गों को नीरोग बनाकर 'अङ्गिरस' बनता है-एक-एक अङ्ग में रसवाला-लोच व लचकवाला। यह "भृगु-अङ्गिराः' ही १२ से १४ तक के सूक्तों का ऋषि है। १३वें सूक्त में यह ईश्वर के प्रति नमन करता हुआ प्रार्थना करता है कि -

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