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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/12/3

35 Sukta
4 Mantra
1/12/3
Devata- यक्ष्मनाशनम् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यक्ष्मनाशन सूक्त
Mantra with Swara
मु॒ञ्च शी॑र्ष॒क्त्या उ॒त का॒स ए॑नं॒ परु॑ष्परुरावि॒वेशा॒ यो अ॑स्य। यो अ॑भ्र॒जा वा॑त॒जा यश्च॒ शुष्मो॒ वन॒स्पती॑न्त्सचतां॒ पर्व॑तांश्च ॥

मु॒ञ्च । शी॒र्ष॒क्त्या: । उ॒त । का॒स: । ए॒न॒म् । परु॑:ऽपरु । आ॒ऽवि॒वेश॑ । य: । अ॒स्य॒ । य: । अ॒भ्र॒ऽजा: । वा॒त॒ऽजा: । य: । च॒ । शुष्म॑: । वन॒स्पती॑न् । स॒च॒ता॒म् । पर्व॑तान् । च॒ ॥

Mantra without Swara
मुञ्च शीर्षक्त्या उत कास एनं परुष्परुराविवेशा यो अस्य। यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्त्सचतां पर्वतांश्च ॥

मुञ्च । शीर्षक्त्या: । उत । कास: । एनम् । परु:ऽपरु । आऽविवेश । य: । अस्य । य: । अभ्रऽजा: । वातऽजा: । य: । च । शुष्म: । वनस्पतीन् । सचताम् । पर्वतान् । च ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे सूर्य! (एनम्) = गतमन्त्र के अनुसार सूर्य-नमस्कार करनेवाले व हवि का सेवन करनेवाले पुरुष को (शीर्षक्त्या:) = सिरदर्द से (मुञ्च) = मुक्त कर, (उत) = और (यः कास:) = जो खाँसी व (अस्य परुष्परु:) = इसके प्रत्येक जोड़ में पीड़ा के रूप में रोग (आविवेश) = प्रविष्ट हो गया है, उस रोग से इसे मुक्त कर। २. (यः) = जो (अभ्रजा:) = बादलों से होनेवाला-इन बादलों व वृष्टि से उत्पन्न सीलबाली वायु से होनेवाला कफ़ का रोग है, (वातजः) = वायु से होनेवाला रोग है, (यः च) = और जो (शुष्म:) = पैत्तिक विकार के कारण अङ्गों के शोषण का कारणभूत रोग है-उस सबको हे सूर्य! तू दूर करनेवाला है। ३. इन रोगों के होने पर यह रोगी (वनस्पतीन् सचताम्) = विविध वनस्पतियों का सेवन करनेवाला हो (च) = और आवश्यक होने पर (पर्वतान्) = पर्वतों का सेवन करे। पर्वतों का जलवायु पैत्तिक विकारों में विशेषरूप से लाभकारी होता है।
Essence
सूर्य-किरणों का सेवन 'सिरदर्द, खाँसी व सन्धिपीड़ाओं से मुक्त करता है और वनस्पतियों व पर्वत-वायु का सेवन मनुष्य को कफ़, वात व पित्त के विकारों से बचाता है।
Subject
सोहन सिरदर्द, खाँसी व सन्धिपीड़ा से छुटकारा