Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/12/2

35 Sukta
4 Mantra
1/12/2
Devata- यक्ष्मनाशनम् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यक्ष्मनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अङ्गेअ॑ङ्गे शो॒चिषा॑ शिश्रिया॒णं न॑म॒स्यन्त॑स्त्वा ह॒विषा॑ विधेम। अ॒ङ्कान्त्स॑म॒ङ्कान्ह॒विषा॑ विधेम॒ यो अग्र॑भी॒त्पर्वा॑स्या॒ ग्रभी॑ता ॥

अङ्गे॑ऽअङ्गे । शो॒चिषा॑ । शि॒श्रि॒या॒णम् । न॒म॒स्यन्त॑: । त्वा॒ । हविषा॑ । वि॒धे॒म॒ । अ॒ङ्कान् । स॒म्ऽअ॒ङ्कान् । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ । य: । अग्र॑भीत् । पर्व॑ । अ॒स्य॒ । ग्रभी॑ता ॥

Mantra without Swara
अङ्गेअङ्गे शोचिषा शिश्रियाणं नमस्यन्तस्त्वा हविषा विधेम। अङ्कान्त्समङ्कान्हविषा विधेम यो अग्रभीत्पर्वास्या ग्रभीता ॥

अङ्गेऽअङ्गे । शोचिषा । शिश्रियाणम् । नमस्यन्त: । त्वा । हविषा । विधेम । अङ्कान् । सम्ऽअङ्कान् । हविषा । विधेम । य: । अग्रभीत् । पर्व । अस्य । ग्रभीता ॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. हे सूर्य! (अङ्गेअङ्गे) = एक-एक अङ्ग में (शोचिषा) = दीति से (शिश्रियाणम्) = आनय करते हुए (त्वा) = तुझे (नमस्यन्त:) = नमस्कार करते हुए हम (हविषा) = दानपूर्वक अदन [भक्षण] से अथवा अग्निहोत्र से विधेम-[विध्-topierce, Io cur] रोगों को कोटनेवाले बनें तथा [ग] हवि का सेवन करें-प्रात:-सायं घर पर अग्निहोत्र करें तथा यज्ञशेष का ही सेवन करें। ये तीन बातें हमें अवश्य ही रोगों से मुक्त करेंगी। २. हम (हविषा) = हवि के द्वारा, अग्निहोत्र के द्वारा तथा यज्ञशेष के सेवन द्वारा (अडान्) = लक्षणों को समकान्-उत्तम लक्षण (विधेम) = बनाएँ। "अङ्क' शब्द का अर्थ शरीर [Body] भी है। हम हवि के द्वारा शरीरों को उत्तम बनाएँ और (य:) = जो (ग्रभीता) = पकड़ लेनेवाला रोग (अस्य) = इसके (पर्व) = जोड़ों को (अग्रभीत्) = जकड़ बैठा है, उस रोग को भी हवि के द्वारा काटनेवाले हों। ऋग्वेद [१०1१६१।१] में ('नाहिर्जग्नह यदि वैतदेनम') इन शब्दों से इस भाव को कहा गया है।
Essence
सूर्य-नमस्कार व्यायाम करते हुए सूर्य-दीप्ति को अपने शरीर पर लेते हुए तथा अग्निहोत्र के द्वारा और भोजन में यज्ञशेष के सेवन से रोग कट जाते हैं, शरीर सुलक्षणोंवाला बनता है और वात-पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं।
Subject
सूर्य-नमस्कार