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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 1/11/6

35 Sukta
6 Mantra
1/11/6
Devata- पूषादयो मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- नारीसुखप्रसूति सूक्त
Mantra with Swara
यथा॒ वातो॒ यथा॒ मनो॒ यथा॒ पत॑न्ति प॒क्षिणः॑। ए॒वा त्वं द॑शमास्य सा॒कं ज॒रायु॑णा प॒ताव॑ ज॒रायु॑ पद्यताम् ॥

यथा॒ वातो॒ यथा॒ मनो॒ यथा॒ पत॑न्ति प॒क्षिणः॑ । ए॒वा त्वं द॑शमास्य सा॒कं ज॒रायु॑णा प॒ताव॑ ज॒रायु॑ पद्यताम् ॥

Mantra without Swara
यथा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिणः। एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम् ॥

यथा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिणः । एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यथा) = जैसे (वात:) = वायुः [पतति] सहज स्वभाव से चलती है, यथा मन:-जैसे मन तीव्र गतिवाला होता है, (यथा) = जैसे (पक्षिण:) = पक्षी (पतन्ति) = दोनों पलों से गति करते हैं, (एव) = उसी प्रकार हे (दशमास्य) = दस मास की अवस्थावाले गर्भ से बाहर आनेवाले बालक! (त्वम्) = तू जरायुणा (साकम्) = जेर के साथ (पत) = गतिवाला हो, गर्भ से बाहर आ और (जरायु) = यह जेर (अवपद्यताम्) = तुझसे पृथक् हो जाए। २. वायु की सहज गति की भाँति गर्भ सहज गति से बाहर आनेवाला हो। मन की शीघ्र गति को भौति बाहर आने की क्रिया में तनिक भी विलम्ब न हो। पक्षियों के दोनों पड़ों की गति की भांति इस उत्पन्न बालक के अवर व पर-दोनों गात्र ठीक हों। इसकी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियाँ ठीक प्रकार से कार्य करनेवाली हों।
Essence
सन्तान के प्रसव का ठीक समय वही है जब वह दशमास्य होता है। यह दशमास्य दशम दशक तक-शतवर्षपर्यन्त जीनेवाला होता है।
Subject
दशमास्य यथा वातो
Special
सूक्त के आरम्भिक मन्त्र में कहा है कि पुरुष अर्यमा, होता व वेधा' हो, स्त्री ऋत-प्रजाता हो तो सन्तान सुख से प्रसूत होती है [१]। सुख-प्रसव के लिए देवों के सम्पर्क में रहना आवश्यक है [२]। माता को प्रसन्न मनवाला होना चाहिए [३], तभी बालक की सब धातुएँ भी ठीक बनेंगी [४]। माता के गर्भाङ्गों का ठीक विकास सुख-प्रसूति के लिए आवश्यक है [५]। ऐसा होने पर यह दस मास का बालक सुखपूर्वक गति करता हुआ बाहर आ जाता है [६]। जिस प्रकार जरायु के आवरण से निकलकर बालक प्रकट होता है, उसी प्रकार मेघों के आवरण से निकलकर सूर्य चमक उठता है। सूर्य भी मानो जरायुज है