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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 1/11/5

35 Sukta
6 Mantra
1/11/5
Devata- पूषादयो मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- नारीसुखप्रसूति सूक्त
Mantra with Swara
वि ते॑ भिनद्मि॒ मेह॑नं॒ वि योनिं॒ वि ग॒वीनि॑के। वि मा॒तरं॑ च पु॒त्रं च॒ वि कु॑मा॒रं ज॒रायु॒णाव॑ ज॒रायु॑ पद्यताम् ॥

वि । ते॒ । भि॒न॒द्मि॒ । मेह॑नम् । वि । योनि॑म् । वि । ग॒वीनि॑के॒ इति॑ ।वि । मा॒तर॑म् । च॒ । पु॒त्रम् । च॒ । वि । कु॒मा॒रम् । ज॒रायु॑णा । अव॑ । ज॒रायु॑ । प॒द्य॒ता॒म् ॥

Mantra without Swara
वि ते भिनद्मि मेहनं वि योनिं वि गवीनिके। वि मातरं च पुत्रं च वि कुमारं जरायुणाव जरायु पद्यताम् ॥

वि । ते । भिनद्मि । मेहनम् । वि । योनिम् । वि । गवीनिके इति ।वि । मातरम् । च । पुत्रम् । च । वि । कुमारम् । जरायुणा । अव । जरायु । पद्यताम् ॥

Meaning
१. हे मात: ! (ते) = तेरे (मेहनम्) = गर्भ-मार्ग को (विभिनधि) = विशेषरूप से खुला करता हूँ। इसीप्रकार (योनिम्) = योनि को भी (वि) = खुला करता हूँ और (गवीनिके) = दोनों नाड़ियों को भी वि-खुला करता हूँ। इन सबके संकीर्ण न होने से सन्तान का सुख-प्रसव होता है। २. बाहर आने पर (मातरं च पुत्रं च) = माता व पुत्र को (वि) = अलग-अलग करते हैं। उन्हें जोड़नेवाली नाड़ी को काटकर उनके पृथक् जीवन का आरम्भ करते हैं। आज तक माता ही खाती थी, उसकी रस आदि धातुएँ बनकर बच्चे को उस नाड़ी से प्राप्त हो जाती थीं। अब बच्चा स्वयं खाएगा और स्वतन्त्ररूपेण शरीर-धातुओं को उत्पन्न करेगा। ३. (कुमारं जरायुणा वि) = इस उत्पन्न कुमार को जरायु से पृथक् करते हैं। अब यह आवरण उसके लिए अनावश्यक हो गया है, अत: यह (जरायु) = जेर (अवपद्यताम्) = नीचे गिर जाए-बच्चे के शरीर से पृथक् हो जाए।
Essence
सब मार्गों के ठीक विकास से ही सुख-प्रसव सम्भव होता है।
Subject
अङ्ग-विकास

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