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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/11/3

35 Sukta
6 Mantra
1/11/3
Devata- पूषादयो मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- चतुष्पदा उष्णिग्गर्भा ककुम्मती अनुष्टुप् Suktam- नारीसुखप्रसूति सूक्त
Mantra with Swara
सू॒षा व्यू॑र्णोतु॒ वि योनिं॑ हापयामसि। श्र॒थया॑ सूषणे॒ त्वमव॒ त्वं बि॑ष्कले सृज ॥

सू॒पा । वि । ऊ॒र्णो॒तु॒ । वि । योनि॑म् । हा॒प॒या॒म॒सि॒ । श्र॒थय॑ । सू॒ष॒णे॒ । त्वम् । अव॑ । त्वम् । बि॒ष्क॒ले॒ । सृ॒ज॒ ॥

Mantra without Swara
सूषा व्यूर्णोतु वि योनिं हापयामसि। श्रथया सूषणे त्वमव त्वं बिष्कले सृज ॥

सूपा । वि । ऊर्णोतु । वि । योनिम् । हापयामसि । श्रथय । सूषणे । त्वम् । अव । त्वम् । बिष्कले । सृज ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (सूषा) = [सूपति, begets] सन्तान को जन्म देनेवाली यह माता वि (ऊर्णोतु) = आवरण को दूर हटानेवाली हो। (योनिम्) = योनि-प्रदेश को (विहापयामसि) = खला करते हैं। योनिप्रदेश की संकीर्णता के कारण सुख-प्रसव में होनेवाली बाधा को दूर करते हैं। २. हे (सूषणे) = उत्तम सन्तान को जन्म देनेवाली जननि! (त्वम्) = तू (श्रथय) = प्रसन्न मनोवृत्तिवाली हो [to beglad] | सुख-प्रसव के लिए मानस प्रसाद की अत्यन्त आवश्यकता है। मन के विकास के साथ अन्य अङ्गों का भी विकास होता है और मन के मुरझाने के साथ अन्य अङ्गों का भी सङ्कोच । यह सोच सुख प्रसव में बाधा बनता है। ३. हे (बिष्कले) = [बिष्कल to kill] विनों को नष्ट करनेवाली अथवा [बिष्क to see, perceive] सब स्थिति को ठीक रूप में देखनेवाली वीर स्त्रि। (त्वम्) = तू (अवसुज) = सब अङ्गों को शिथिल कर दे। उनमें किसी प्रकार का तनाव न रहने दे और इसप्रकार सुख से सन्तान को जन्म देनेवाली हो।
Essence
सुख-प्रसव के लिए आवश्यक है कि [क] योनि-प्रदेश संकीर्ण न हो, [ख] माता प्रसन्न मनवाली हो और [ग] अङ्गों में किसी प्रकार का तनाव न हो।
Subject
सूषणा-विष्कला