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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/11/2

35 Sukta
6 Mantra
1/11/2
Devata- पूषादयो मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- नारीसुखप्रसूति सूक्त
Mantra with Swara
चत॑स्रो दि॒वः प्र॒दिश॒श्चत॑स्रो॒ भूम्या॑ उ॒त। दे॒वा गर्भं॒ समै॑रय॒न्तं व्यू॑र्णुवन्तु॒ सूत॑वे ॥

चत॑स्र:‍ । दि॒व: । प्र॒ऽदिश॑: । चत॑स्र: । भूम्या॑: । उ॒त । दे॒वा: । गर्भ॑म् । सम् । ऐ॒र॒य॒न् । तम् । वि । ऊ॒र्णु॒व॒न्तु॒ । सूत॑वे ॥

Mantra without Swara
चतस्रो दिवः प्रदिशश्चतस्रो भूम्या उत। देवा गर्भं समैरयन्तं व्यूर्णुवन्तु सूतवे ॥

चतस्र:‍ । दिव: । प्रऽदिश: । चतस्र: । भूम्या: । उत । देवा: । गर्भम् । सम् । ऐरयन् । तम् । वि । ऊर्णुवन्तु । सूतवे ॥

Meaning
१. (दिवः) = धुलोक की (चतस्त्रः प्रदिश:) = चारों प्रकृष्ट दिशाएँ, (भम्याः चतस्त्र:) = भूमि की चारों दिशाएँ (उत) = और (देवा:) = इन दिशाओं में स्थित सब देव (गर्भम्) = गर्भ को (सम् एरयन्) = सम्यक्तया उस-उस शक्ति को प्राप्त करानेवाले होते हैं। 'धुलोक की चारों दिशाएँ तथा भूमि की चारों दिशाएँ इस वाक्यांश [मुहावरे] का भाव यही है कि 'सारा ब्रह्माण्ड'। वस्तुत: यह शरीर-पिण्ड ब्रह्माण्ड का छोटा रूप होता है-('यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे')। इस पिण्ड में ब्रह्माण्ड के सूर्यादि देव अपनी-अपनी शक्ति प्राप्त कराते हैं। सूर्य ही 'चक्षु' का रूप धारण करके आँख में रहने लगता है, वायु 'प्राण' बनकर नासिका में, अग्नि 'वाक्' बनकर मुख में। इसीप्रकार भिन्न-भिन्न सब देव शरीर में वास करके शरीर को सशक्त बनाते हैं। गर्भिणी नारी इन देवों के सम्पर्क में रहती हुई गर्भस्थ सन्तान को इन सब देवों की शक्ति से युक्त करती हैं। २. अब ये सब देव (ताम्) = उस गर्भस्थ सन्तान को (सूतवे) = सुख-प्रसव के लिए (वि ऊर्तुवन्तु) = गर्भ के आवरण से रहित करें, गर्भ के आच्छादन से बाहर लानेवाले हों। यहाँ यह स्पष्ट है कि जो स्त्री सूर्य-किरणों व वायु आदि के सम्पर्क में रहेगी, खुली दिशाओं में विहारशील होगी, वह सन्तान को सुख से जन्म देनेवाली होगी।
Essence
सूर्यादि देवों का सम्पर्क सुख-प्रसूति में अत्यन्त सहायक है।
Subject
देवों का सम्पर्क व सुख-प्रसव

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