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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/10/4

35 Sukta
4 Mantra
1/10/4
Devata- वरुणः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पाशविमोचन सूक्त
Mantra with Swara
मु॒ञ्चामि॑ त्वा वैश्वान॒राद॑र्ण॒वान्म॑ह॒तस्परि॑। स॑जा॒तानु॑ग्रे॒हा व॑द॒ ब्रह्म॒ चाप॑ चिकीहि नः ॥

मु॒ञ्चामि॑ । त्वा॒ । वै॒श्वा॒न॒रात् । अ॒र्ण॒वात् । म॒ह॒त: । परि॑ । स॒ऽजा॒तान् । उ॒ग्र॒ । इ॒ह । आ । व॒द॒ । ब्रह्म॑ । च॒ । अप॑ । चि॒की॒हि॒ । न॒: ॥

Mantra without Swara
मुञ्चामि त्वा वैश्वानरादर्णवान्महतस्परि। सजातानुग्रेहा वद ब्रह्म चाप चिकीहि नः ॥

मुञ्चामि । त्वा । वैश्वानरात् । अर्णवात् । महत: । परि । सऽजातान् । उग्र । इह । आ । वद । ब्रह्म । च । अप । चिकीहि । न: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्रों के अनुसार जब हम द्रोह और असत्य से ऊपर उठने का निश्चय करते हैं तब प्रभु कहते हैं कि मैं (त्वा) = अद्रोही व सत्यनिष्ठ तुझे इस (महतः) = महान् (वैश्वानरात्) = सब मनुष्यों के विचरण के स्थानभूत (अर्णवात्) = भवसागर से (परिमुञ्चामि) = मुक्त करता हूँ। भवसागर से तैरने के लिए (ऋतस्य नाव: सकृतमपीपरन्) = सत्य की नाव अत्यन्त उपयोगी है। सत्य और अद्रोह [अहिंसा] को अपनाकर हम मोक्ष का साधन कर पाते हैं। २. प्रभु कहते हैं कि उग्र-सत्य व अद्रोह के पालन से तेजस्वी बना हुआ तू (इह) = इस जीवन में (सजातान्) = अपने समान जन्मवाले इन मनुष्यों को (आवद) = इस ज्ञान का उपदेश कर-इस ज्ञान का कथन कर। इसके द्वारा उन्हें भी सत्य व अद्रोह के महत्व को समझा (च) = और तू स्वयं (न:) = हमारे (ब्रह्म) = इस वेदज्ञान को (अपचिकीहि) = अच्छी प्रकार जाननेवाला बन ['अप' उपसर्ग यहाँ 'निर्देश' अर्थ में आया है] और जानकर औरों के प्रति उसका निर्देशक बन।
Essence
संसार-सागर को तैरने के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञान प्राप्त करके उसका .समुचित प्रसार करें।
Subject
भवसागर से पार मुञ्चामि
Special
सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि वासनाओं के नाश के द्वारा मैं अपने को प्रभु का कोपभाजन नहीं होने देता [१], मैं द्रोह से ऊपर उठता हूँ [२], असत्य से दूर होता हूँ और [३] इसप्रकार ज्ञान-प्रसार करता हुआ भवसागर से पार होता हूँ [४]। इसप्रकार की उत्तम वृत्ति होने पर हमारी सन्तान भी उत्तम बनती हैं -