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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/10/3

35 Sukta
4 Mantra
1/10/3
Devata- असुरः Rishi- अथर्वा Chhanda- ककुम्मती अनुष्टुप् Suktam- पाशविमोचन सूक्त
Mantra with Swara
यदु॒वक्थानृ॑तम्जि॒ह्वया॑ वृजि॒नं ब॒हु। राज्ञ॑स्त्वा स॒त्यध॑र्मणो मु॒ञ्चामि॒ वरु॑णाद॒हम् ॥

यत्‍ । उ॒वक्थ॑ । अनृ॑तम्‍ । जि॒ह्वया॑ । वृ॒जि॒नम्‍ । ब॒हु । राज्ञ॑: । त्वा॒ । स॒त्यऽध॑र्मण: । मु॒ञ्चामि॑ । वरु॑णात् । अ॒हम् ॥

Mantra without Swara
यदुवक्थानृतम्जिह्वया वृजिनं बहु। राज्ञस्त्वा सत्यधर्मणो मुञ्चामि वरुणादहम् ॥

यत्‍ । उवक्थ । अनृतम्‍ । जिह्वया । वृजिनम्‍ । बहु । राज्ञ: । त्वा । सत्यऽधर्मण: । मुञ्चामि । वरुणात् । अहम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यत्) = जो (जिह्वया) = जिला से (बहु) = बहुत अधिक (अनृतम्) = असत्य को तथा (वृजिनम्) = पाप को-पाप-वचन को (उवक्थ) = तूने अब तक बोला है (त्वा) = तुझे (सत्यधर्मण:) = सत्य का धारण करनेवाले (राज्ञः वरुणात्) = उस शासक, अनृतवादी के पाशों को छिन्न करनेवाले प्रभु के स्मरण के द्वारा (अहम्) = मैं (मुञ्चामि) = उस पाप से छुड़ाता हूँ। २. जब हम उस प्रभु का शासक के रूप में स्मरण करते हैं तब हमारी असत्य भाषणादि की वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। प्रभु का विस्मरण ही हमें पाप की ओर ले-जाता है।
Essence
हम प्रभु का वरुणरूप में स्मरण करते हैं और असत्य से दूर होते हैं।
Subject
असत्य से दूर