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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/10/2

35 Sukta
4 Mantra
1/10/2
Devata- वरुणः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- पाशविमोचन सूक्त
Mantra with Swara
नम॑स्ते राजन्वरुणास्तु म॒न्यवे॒ विश्वं॒ ह्यु॑ग्र निचि॒केषि॑ द्रु॒ग्धम्। स॒हस्र॑म॒न्यान्प्र सु॑वामि सा॒कं श॒तं जी॑वाति श॒रद॒स्तवा॒यम् ॥

नम॑: । ते॒ । रा॒ज॒न्‍ । व॒रु॒ण॒ । अ॒स्तु॒ । म॒न्यवे॑ । विश्व॑म्‍ । हि । उ॒ग्र॒ । नि॒ऽचि॒केषि॑ । द्रु॒ग्धम्‍ । स॒हस्र॑म्‍ । अ॒न्यान्‍ । प्र । सु॒वा॒मि॒ । सा॒कम्‍ । श॒तम्‍ । जी॒वा॒ति॒ । श॒रद॑: । तव॑ । अ॒यम्‍ ॥

Mantra without Swara
नमस्ते राजन्वरुणास्तु मन्यवे विश्वं ह्युग्र निचिकेषि द्रुग्धम्। सहस्रमन्यान्प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तवायम् ॥

नम: । ते । राजन्‍ । वरुण । अस्तु । मन्यवे । विश्वम्‍ । हि । उग्र । निऽचिकेषि । द्रुग्धम्‍ । सहस्रम्‍ । अन्यान्‍ । प्र । सुवामि । साकम्‍ । शतम्‍ । जीवाति । शरद: । तव । अयम्‍ ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (राजन् वरुण) = संसार का शासन करनेवाले-पापियों को पाशों से जकड़नेवाले प्रभो! (ते मन्यवे नमः अस्तु) = आपके मन्यु के लिए हम नमस्कार करते हैं। आपका क्रोध हमें दण्डित करनेवाला न हो। हे (उग्र) = तेजस्विन् प्रभो! हम इस बात को अच्छी प्रकार समझते हैं कि आप (विश्वं दुग्धम) = सम्पूर्ण द्रोह को (हि) = निश्चय से (निचिकेषि) = जानते हैं। हमारे मनों में उठनेवाली द्रोह की भावनाएँ आपसे छिपी नहीं हैं, अत: मैं द्रोह की सम्पूर्ण भावनाओं से ऊपर उठता है। २. इनसे ऊपर उठता हुआ मैं (सहस्त्रम्) = हज़ारों (अन्यान्) = अन्य पुरुषों को भी (साकम्) = अपने साथ (प्रसवामि) = अद्रोह की भावना से चलने के लिए प्रेरित करता हूँ। स्वयं अद्रोहवाला होकर औरों को भी अद्रोह के लिए कहता हूँ। इसप्रकार (तव अयम्) = आपका यह पुरुष (शतं जीवाति) = सौ वर्ष तक जीनेवाला बनता है। अद्रोह की वृत्ति का दीर्घजीवन से सम्बन्ध है। मन में उत्पन्न होनेवाली द्रोह की भावनाएँ वस्तुत: हमारे ही जीवन का द्रोह करती हैं और हम अल्प जीवनवाले हो जाते हैं।
Essence
प्रभु का प्रिय व्यक्ति कभी द्वेष नहीं करता।
Subject
अ-द्रोह