Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/1/3

35 Sukta
4 Mantra
1/1/3
Devata- वाचस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- मेधा जनक
Mantra with Swara
इ॒हैवाभि वि त॑नू॒भे आर्त्नी॑ इव॒ ज्यया॑। वा॒चस्पति॒र्नि य॑च्छतु॒ मय्ये॒वास्तु॒ मयि॑ श्रु॒तम् ॥

इ॒ह । ए॒व । अ॒भि । वि । त॒नु॒ । उ॒भे इति॑ । आलीं॑ इ॒वेत्यार्ली॑ऽइव । ज्यया॑ ।वा॒चः । पति॑: । नि । य॒च्छ॒तु॒ । मयि॑ । ए॒व । अ॒स्तु॒ । मयि॑ । श्रु॒तम् ॥

Mantra without Swara
इहैवाभि वि तनूभे आर्त्नी इव ज्यया। वाचस्पतिर्नि यच्छतु मय्येवास्तु मयि श्रुतम् ॥

इह । एव । अभि । वि । तनु । उभे इति । आलीं इवेत्यार्लीऽइव । ज्यया ।वाचः । पति: । नि । यच्छतु । मयि । एव । अस्तु । मयि । श्रुतम् ॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (इव) = जैसे (उभे आर्त्नी॑) = धनुष की दोनों कोटियों को ज्यया-डोरी से तान देते हैं-कसकर बाँध देते हैं, उसी प्रकार (इह एव) = यहाँ-राष्ट्र व समाज में ही आचार्य व शिष्यरूपी राष्ट्र-धनुष की दोनों कोटियों को (अभिवितनु) = अपरा व परा-विद्यारूपी ज्या से तान दो। जिस प्रकार धनुष की दो कोटियों में कोई भी कोटि कम महत्त्व की नहीं होती, इसीप्रकार राष्ट्र में आचार्य व शिष्य दोनों का समानरूप से महत्त्व है। आचार्य के बिना विद्यार्थी नहीं, विद्यार्थी के बिना आचार्य नहीं। घर में पति-पत्नी का जैसे समान महत्त्व है, उसी प्रकार शिक्षणालय में आचार्य व शिष्य का। आचार्य को बनाना है, विद्यार्थी को बनना है।

२. (वाचस्पति:) = ज्ञान का स्वामी आचार्य अथ प्रथम काण्डम् (नियच्छतु) = विद्यार्थी को नियम में रक्खे। बिना नियन्त्रण के विद्यार्थी का निर्माण नहीं हो सकता। अनियन्त्रित छात्र बड़ा होकर राष्ट्र के लिए हितकर नहीं होगा। अनियन्त्रण में पढ़ेगा भी क्या? ३. इसलिए विद्यार्थी की भी यही कामना हो कि आचार्य मेरा नियन्त्रण करे, जिससे श्रुतम्-आचार्य मुख से सुना हुआ ज्ञान (मयि) = मुझमें और (मयि एव) = मुझमें ही (अस्तु) = स्थिर रहे।
Essence
आचार्य और विद्यार्थी राष्ट्र-धनुष की दो कोटियाँ हैं। इनकी ज्या विद्या' है। आचार्य विद्यार्थियों को नियन्त्रण में चलाता है, जिससे उनका ज्ञान उनमें स्थिर रहे।
Subject
समाज-धनुष की दो कोटियाँ-'आचार्य और शिष्य'